भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल को इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (IMF) में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के पद पर नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति तीन साल के कार्यकाल के लिए हुई है। इस महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी को संभालने वाले पटेल पहले भी IMF में काम कर चुके हैं और भारत की आर्थिक नीतियों में उनका योगदान लंबे समय से अहम रहा है।
IMF में भारत की आवाज़
IMF का कार्यकारी निदेशक मंडल वैश्विक आर्थिक स्थिरता, वित्तीय निगरानी और ऋण कार्यक्रमों से जुड़ी नीतियों को दिशा देता है। उर्जित पटेल का इस बोर्ड में आना भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस नियुक्ति से न केवल भारत की विशेषज्ञता को वैश्विक मंच पर मान्यता मिली है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुभवों और विचारों को IMF जैसी संस्था में अधिक मजबूती से रखा जा सकेगा।
कौन हैं उर्जित पटेल?
र्जित पटेल का जन्म 1963 में केन्या में हुआ था। उनका पारिवारिक मूल गुजरात से है। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट किया है और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में काम किया है। 1998 से 2001 तक वे भारत के केंद्रीय वित्त मंत्रालय में सलाहकार रह चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने IMF, रिलायंस इंडस्ट्रीज, IDFC लिमिटेड, MCX लिमिटेड, और गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन जैसी संस्थाओं में भी जिम्मेदारी निभाई है।
RBI गवर्नर के रूप में भूमिका
उर्जित पटेल को अगस्त 2016 में रघुराम राजन के बाद RBI का गवर्नर नियुक्त किया गया था। उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी घटना रही नोटबंदी, जिसे नवंबर 2016 में लागू किया गया। इस ऐतिहासिक फैसले के दौरान उन्होंने मौद्रिक नीतियों को संभालने की अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बैंकिंग सेक्टर में NPA (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) को सख्ती से निपटाने के लिए कठोर नियम लागू किए।
हालांकि, दिसंबर 2018 में उन्होंने अचानक RBI गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया। कहा गया कि उनकी सरकार के साथ नीति संबंधी असहमति थी। यह एक दुर्लभ स्थिति थी जब कोई गवर्नर कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ता है।
'पैसे के ढेर पर बैठा सांप' विवाद
उनके इस्तीफे के बाद पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की किताब ‘We Also Make Policy’ में बड़ा खुलासा हुआ। गर्ग ने दावा किया कि एक मीटिंग के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उर्जित पटेल को "पैसे के ढेर पर बैठा सांप" कहा था, क्योंकि वह सरकार की कुछ मांगों को पूरा नहीं कर रहे थे। यह बयान तब काफी चर्चित हुआ और उर्जित पटेल के इस्तीफे की वजहों को और मजबूती मिली।
निष्कर्ष
उर्जित पटेल की IMF में नियुक्ति भारतीय अर्थव्यवस्था की वैश्विक स्वीकार्यता का संकेत है। हालांकि उनका RBI कार्यकाल उतार-चढ़ाव से भरा रहा, लेकिन उनकी विशेषज्ञता और अनुभव को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वीकार किया गया है। अब देखना होगा कि वह IMF में भारत की नीतिगत सोच को कितनी मजबूती से प्रस्तुत कर पाते हैं और वैश्विक आर्थिक दिशा को किस तरह प्रभावित करते हैं। उनकी यह भूमिका निश्चित रूप से भारत के आर्थिक कूटनीति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।